Wednesday, July 28, 2010

धर्मयुग को धर्मयुग school आफ journalism बना दिया डॉ धर्मवीर भारती ने
डॉ धर्मवीर भारती. एक अनुशासन प्रिय पत्रकार. anusasashanhinta उन्हें बर्दाश्त न थी. उनका मानना था कि अनुशासन पत्रकारिता का सबसे अहम हिस्सा है. उनके साथ जिन -जिन पत्रकारों को भी काम करने का सौभाग्य prapt हुआ, वे सभी आज पत्रकारिता जगत के स्थापित स्तंभ बन चुके हैं. तभी तो आज भी धर्मयुग को धर्मयुग school of journalism की उपाधि भी नवाजा जाता है. कन्हैया, रवींद्र प्रमोद शंकर, योगेंद्र कुमार, सुरेंद्र प्रताप सिंह कुछ ऐसे ही नाम है. धर्मवीरजी की मृत्यु के बाद जितने भी संपादकों ने धर्मयुग की कुरसी sambhali धर्मवीर के असितत्व व उमकी परंपरा व मर्यादा को बरकरार रखा. इसी वर्ष उनकी kaalजयी कृति कनुप्रिया भी 50 वर्ष की हो जायेगी.25 दिसंबर डॉ धर्मवीर भारती के जन्मदिवस पर भारती के व्‌यक्तित्व व हिंदी पत्रकारिता में उनके योगदान पर प्रकाश daal रहे हैं धर्मवीर के साथ पत्रकारिता कर चुके व वर्तमान में नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव

पत्रकारिता चाहे किसी भी दौर की हो, वह वक्त से आगे की सोच रखती है. उसे हर वक्त चौंकन्ना रहना पड़ता है. तभी aam logo को प्रभावित कर पाती है. कुछ ऐसा ही नजरिया रखते थे डॉ धर्मवीर भारती. उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को न सिर्फŸ एक नयी परिभाषा में पिरोया, बल्‌िक एक नये अध्याय की भी शुरुआत की. पत्रकारिता में साहित्य को महत्वपूर्ण सिरे से जोड़ कर उन्होंंने इस मिथ को दूर किया कि साहित्य सामान्य व्‌यक्ति का विषय नहीं हो सकता. उनके विषय वस्तु का चयन कुछ ऐसा होता था कि वह सामान्य व्‌यक्ति की समझ में भी आ जाये व साहित्यकार भी उनकी रचना से पूरी तरह संतुï हो पायें. darasal , उन्होंने पत्रकारिता में एक नयी परंपरा की भी शुरुआत की. देश के सर्वश्रेð bेखकों को जोड़ने की परंपरा. उनके bिए कभी व्‌यक्ति नहीं बल्‌िक रचनाएं अहम होती थीं. चाहे कितने भी बड़े-बड़े bेखकों की रचनाएं आ जायें, वे स्तरीय न हो तो उसके bौटाने में जरा भी न झिझकते. उन्होंने कभी बड़े नाम को तव‚ाो नहीं दी.अगर सामान्य व्‌यक्ति की रचना भी स्तरीय हैं, तो वे उसे स्थान देते थे. उस दौर में धर्मयुग की इतनी प्रतिðा थी कि उसमें प्रकाशित होने के बाद उन bेखकों, कहानीकारों व कवियों की गिनती देश के श्रेð साहित्यकारों में होने bगती थी. वे अनुशासन प्रिय संपादक थे. वे कभी दफ्‌तर देर से नहीं पहुंचे. जल्‌दी आते. देर से जाते. बार-बार आbेखों को पढ़ते. मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी किसी रचना को बस सरसरी निगाह से पढ़ कर प्रकाशित होने के bिए भेज दिया हो. शायद उनके संपादन के इसी नायाब तरीके ने धर्मयुग को माइbस्टोन बनाया.
शीषर्क ः bेखकों को अपना बनाने की कbा में माहिर थे धर्मवीर
या
पत्रकारिता को कमिटमेंट व मिशन मानते थे डॉ भारती
पुष्‌पा भारती
धर्मयुग का एक-एक शब्‌द धर्र्मवीर जी की नजरों से होकर गुजरता था. वे रात-दिन उसकी तैयारी में जुटे रहते थे. किसी साधना की तरह. वे अपना धर्म-कर्म सबकुछ पत्रकारिता को ही मानते थे. मैं तो मान बैठी थी कि धर्मयुग मेरी सौत बन गयी है. दिन-रात की उन्हें चिंता ही नहीं थी. पर धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि उनके bिए पत्रकारिता एक मिशन है न कि जीविकोपार्जन का साधन. वे पत्रों के माध्यम से संपर्क बनाने में माहिर थे. bेखकों को अपना बनाना उन्हें अच्‌छी तरह आता था. एक bेखक से आbेख मंगवाने के bिए वे कई-कई चिÆियां bिखा करते थे . सबसे पहbे उन्हें विषय वस्तु बताने के bिए, दूसरी बार उन्हें यह सूचित करते कि हम इसे किस अंक में bेंगे. अगbे पत्र में उन्हें यह सूचित करते कि आपका आbेख हम तक पहुंच गया है. फिŸर अंततः हमने उस आbेख को इस अंक में संग्रहित किया है. उन्होंने अपनी इस कbा से देश के प्रतिðित bेखकों को व्‌यक्तिगत तौर पर भी अपना बना bिया था.